>टूटती कड़ियाँ

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राह के आखिरी मोड़ पर जब मिलती है मंजिल,
मिट जाते हैं समय की रेत पर साथियोँ के निशाँ

दिन और रात, जब चाँद के साथ, हम जगा करते थे,
यार के कंधो पर सर रखकर, सुबह आँखें मला करते थे,
आज जब आँखें एक हंसी, और लब ढूँढ़ते हैं एक अदद कान
याद आते हैं, प्यार के वो गुलिस्तां…

लड़ता था उससे, छलनी भी किया दिल,

नफरत की आग में झुलसाया भी, अपने हाथो से पिलाया गरल

लेकिन न एक लफ्ज़, न कोई आह,
बस एक बदतमीज़ मुस्कान, और वही ढीठ निगाह

बहुत दूर निकल आया
उन्ही हाथो के पीछे छोड़कर
जिन्हें थामे कभी किया था शुरू
ज़िन्दगी का लम्बा सफ़र

सामने दिख रही थी बस मंजिल,
होश न रहा की एक हमसफ़र
पीछे छूट गया है, बहुत पहले
याद भी न रही वो पुरानी डगर

मंजिल पर जाकर जब रुका
तो पीछे मुड़ने का ध्यान आया
पर चाह बेमानी हो चुकी थी,
खुद को वीराने में अकेला पाया

राह के आखिरी मोड़ पर जब मिलती है मंजिल,
मिट जाते हैं समय की रेत पर साथियोँ के निशाँ …

 ___________________________________

Dedicated to all my friends. I am a selfish person. Sometimes i get so engrossed in my own loneliness that i forget that without them, i would not have survived at all…oh, i know too well….

Mitostargazer

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Author: Mitostargazer

I read. I write. I listen.

4 thoughts on “>टूटती कड़ियाँ”

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